:
Breaking News

पटना में पूर्व DGP गुप्तेश्वर पांडेय का बड़ा खुलासा, बोले- बिहार में अपहरण की ‘शुरुआत’ एक IPS ने कराई

top-news
https://maannews.acnoo.com/public/frontend/img/header-adds/adds.jpg

पटना में पूर्व DGP गुप्तेश्वर पांडेय ने बड़ा दावा करते हुए कहा कि बिहार में अपहरण की संस्कृति किसी अपराधी ने नहीं, बल्कि एक IPS अधिकारी की सोच से शुरू हुई थी। उन्होंने कानून-व्यवस्था, नीतीश कुमार और समाज की भूमिका पर भी खुलकर बात की।

पटना आलम की खबर।पटना: बिहार के पूर्व पुलिस महानिदेशक रहे गुप्तेश्वर पांडेय एक बार फिर अपने बयान को लेकर सुर्खियों में हैं। इस बार उन्होंने ऐसा दावा किया है, जिसने बिहार की पुरानी कानून-व्यवस्था और अपराध की राजनीति पर नई बहस छेड़ दी है। अब अध्यात्म और सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार में सक्रिय गुप्तेश्वर पांडेय ने राजधानी पटना में पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा कि बिहार में अपहरण की संस्कृति की शुरुआत किसी गैंगस्टर या डकैत ने नहीं, बल्कि एक आईपीएस अधिकारी की रणनीति से हुई थी। उनके इस बयान ने पुलिस व्यवस्था, अपराध नियंत्रण और बिहार के उस दौर की कार्यशैली को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

पूर्व डीजीपी ने कहा कि एक समय बिहार के पश्चिम चंपारण इलाके, खासकर बेतिया और बगहा क्षेत्र में डकैती पुलिस के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई थी। कई गिरोह सक्रिय थे और लगातार वारदातों से पुलिस मुख्यालय पर भारी दबाव बना रहता था। उनके मुताबिक, उस समय अपराध को नियंत्रित करने के बजाय उसे “दिखने” से रोकने की मानसिकता ने हालात को और खराब कर दिया। उन्होंने दावा किया कि एक तत्कालीन एसपी स्तर के अधिकारी ने डकैतों को डकैती छोड़कर फिरौती के लिए अपहरण करने की सलाह दी थी, ताकि रिकॉर्ड में डकैती के मामले कम दिखें और कागजों पर कानून-व्यवस्था बेहतर नजर आए।

यह भी पढ़ें:

बिहार में अपराध और पुलिसिंग पर क्यों बार-बार उठते हैं बड़े सवाल?

गुप्तेश्वर पांडेय ने कहा कि यह कोई साधारण टिप्पणी नहीं, बल्कि बिहार के अपराध इतिहास की एक बेहद गंभीर परत है। उन्होंने संकेत दिया कि यह सोच अपराधियों के लिए एक नए रास्ते का दरवाजा खोलने जैसी थी। जब अपराधियों को यह समझ आ गया कि पैसे वालों को उठाकर फिरौती लेना डकैती से ज्यादा “फायदेमंद” और “कम जोखिम” वाला रास्ता है, तब धीरे-धीरे अपहरण एक संगठित अपराध के रूप में फैलने लगा। उन्होंने यह भी कहा कि उस दौर में आम लोग भय के साये में जीते थे और कई परिवार ऐसे थे, जो अपने प्रियजनों को छुड़ाने के लिए चुपचाप फिरौती देकर मामला खत्म कर देते थे।

उन्होंने कहा कि बिहार ने एक ऐसा समय भी देखा है, जब अपहरण की घटनाएं आम नागरिकों के मन में स्थायी डर बन चुकी थीं। उनके मुताबिक, कई मामले तो ऐसे होते थे जो थाने तक पहुंचते ही नहीं थे। लोग पुलिस के चक्कर, सामाजिक दबाव और जान-माल के खतरे के कारण औपचारिक शिकायत दर्ज कराने से भी बचते थे। ऐसे में अपराध का वास्तविक आंकड़ा सरकारी रिकॉर्ड से कहीं बड़ा होता था। पूर्व डीजीपी का कहना था कि उस दौर की भयावहता को वही लोग सही मायनों में समझ सकते हैं, जिन्होंने उस समय बिहार की सड़कों, कस्बों और गांवों का माहौल देखा हो।

यह भी पढ़ें:

बिहार के अपराध इतिहास में ‘किडनैपिंग इंडस्ट्री’ कैसे बनी बड़ी चुनौती?

पटना में बातचीत के दौरान गुप्तेश्वर पांडेय ने यह भी कहा कि बाद के वर्षों में शासन और पुलिसिंग के तरीके में बदलाव आने के बाद इस स्थिति पर काफी हद तक नियंत्रण पाया गया। उन्होंने नीतीश कुमार के शासनकाल का जिक्र करते हुए कहा कि बिहार को उस भय और अनिश्चितता के दौर से बाहर निकालने में राजनीतिक इच्छाशक्ति की अहम भूमिका रही। उनके अनुसार, कानून-व्यवस्था को लेकर सख्त रवैया, प्रशासनिक जवाबदेही और लगातार निगरानी ने राज्य में अपहरण जैसे अपराधों पर लगाम लगाने में मदद की। उन्होंने यह भी कहा कि आज की स्थिति की तुलना पुराने दौर से की जाए तो बदलाव साफ महसूस किया जा सकता है।

हालांकि, गुप्तेश्वर पांडेय ने यह भी साफ किया कि सिर्फ सरकार या पुलिस के भरोसे अपराध पर पूरी तरह काबू पाना संभव नहीं है। उन्होंने समाज की भूमिका पर विशेष जोर देते हुए कहा कि जब तक आम लोग अपराध के खिलाफ खुलकर खड़े नहीं होंगे, तब तक कोई भी व्यवस्था अकेले पर्याप्त साबित नहीं हो सकती। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कई बार सड़क, मोहल्ले या सार्वजनिक जगहों पर होने वाली गलत घटनाओं के समय लोग मूकदर्शक बने रहते हैं। यही चुप्पी अपराधियों का मनोबल बढ़ाती है। उनके मुताबिक, कानून-व्यवस्था केवल पुलिस की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज और नागरिक चेतना की भी परीक्षा है।

उन्होंने कहा कि यदि समाज जाति, समूह, पहचान और स्थानीय प्रभाव से ऊपर उठकर अपराधी मानसिकता का विरोध करे, तो बहुत कुछ बदला जा सकता है। उनका इशारा इस बात की ओर था कि कई बार सामाजिक और राजनीतिक संरक्षण अपराधियों को बच निकलने का रास्ता दे देता है। यही वजह है कि अपराध का स्थायी समाधान केवल पुलिस कार्रवाई से नहीं, बल्कि सामाजिक अस्वीकृति और सामूहिक प्रतिरोध से संभव होता है। पूर्व डीजीपी की यह टिप्पणी पुलिसिंग से आगे बढ़कर सामाजिक संरचना और जनसहभागिता की ओर भी ध्यान खींचती है।

यह भी पढ़ें:

कानून-व्यवस्था में आम जनता की भूमिका कितनी अहम होती है?

पूर्व डीजीपी ने वर्तमान कानून-व्यवस्था पर भी अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि बिहार में हाल के दिनों में जो आपराधिक घटनाएं सामने आई हैं, उन्हें हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। उनका मानना है कि हर घटना को गंभीरता से लेते हुए त्वरित और सख्त कार्रवाई जरूरी है, ताकि अपराधियों में डर बना रहे। उन्होंने वर्तमान पुलिस नेतृत्व की कार्यशैली की सराहना करते हुए कहा कि अनुभव, अनुशासन और फील्ड समझ पुलिसिंग की रीढ़ होती है। उनका कहना था कि राज्य में कानून-व्यवस्था को बेहतर बनाए रखने के लिए लगातार सक्रियता और जवाबदेही बेहद जरूरी है।

गुप्तेश्वर पांडेय का यह बयान इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि उन्होंने अपने लंबे पुलिस अनुभव के आधार पर यह बात कही है। बिहार पुलिस में शीर्ष पदों पर रह चुके होने के कारण उनकी टिप्पणियों को सामान्य राजनीतिक बयान की तरह नहीं देखा जा रहा। उनके शब्दों में प्रशासनिक अनुभव, अपराध नियंत्रण की जमीन और राज्य की पुरानी चुनौतियों की झलक दिखाई देती है। यही वजह है कि उनके बयान ने न केवल मीडिया का ध्यान खींचा, बल्कि यह चर्चा भी तेज कर दी कि बिहार के अपराध इतिहास में नीति, पुलिसिंग और राजनीतिक इच्छाशक्ति की भूमिका को नए सिरे से समझने की जरूरत है।

उनकी मौजूदा जीवनशैली और सार्वजनिक छवि भी इस बयान को अलग तरह की गंभीरता देती है। कभी बिहार पुलिस के सबसे चर्चित और प्रभावशाली चेहरों में गिने जाने वाले गुप्तेश्वर पांडेय अब आध्यात्मिक जीवन में सक्रिय दिखाई देते हैं। वे इन दिनों सनातन धर्म, श्रीराम कथा और धार्मिक प्रवचनों के जरिए समाज में नैतिकता, चेतना और मूल्यबोध का संदेश देने में जुटे हैं। एक ओर उनका अतीत सख्त पुलिस अधिकारी का रहा है, तो दूसरी ओर वर्तमान में वे आध्यात्मिक मार्ग पर चलकर सामाजिक जागरूकता का संदेश दे रहे हैं। यही विरोधाभास उनके व्यक्तित्व को और अधिक चर्चित बनाता है।

यह भी पढ़ें:

खाकी से कथा तक: कैसे बदला पूर्व DGP गुप्तेश्वर पांडेय का जीवन?

पटना में हुई बातचीत के दौरान उन्होंने बिहार की राजनीति को लेकर भी अपनी राय जाहिर की। उन्होंने नीतीश कुमार को बिहार के सफल मुख्यमंत्रियों में गिनते हुए कहा कि राज्य को दिशा देने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही है। साथ ही उन्होंने यह भी संकेत दिया कि बिहार की राजनीतिक और प्रशासनिक यात्रा में नेतृत्व की भूमिका को कम करके नहीं आंका जा सकता। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि राजनीतिक नेतृत्व के साथ-साथ प्रशासनिक मशीनरी और जनता की भागीदारी भी उतनी ही जरूरी है।

राजनीतिक उत्तराधिकार और नए चेहरों पर हो रही चर्चाओं पर भी उन्होंने सीमित लेकिन संतुलित प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि पढ़े-लिखे और शालीन युवाओं का सार्वजनिक जीवन में आना लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत हो सकता है, लेकिन राजनीति केवल छवि का नहीं, बल्कि अनुभव, जमीन और जनसमझ का भी क्षेत्र है। इस टिप्पणी को भी कई लोग बिहार की बदलती राजनीति के संदर्भ में देख रहे हैं।

पूर्व डीजीपी के इस बयान का असर आने वाले दिनों में राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में भी दिखाई दे सकता है। एक ओर यह बयान बिहार के पुराने अपराध मॉडल पर सवाल उठाता है, तो दूसरी ओर यह इस बात की भी याद दिलाता है कि किसी राज्य की कानून-व्यवस्था केवल अपराधियों की सक्रियता से नहीं, बल्कि व्यवस्था की प्राथमिकताओं और नीतिगत सोच से भी प्रभावित होती है। यदि किसी दौर में अपराध को “कंट्रोल” करने के नाम पर उसकी दिशा बदल दी जाए, तो उसका असर समाज पर वर्षों तक रह सकता है। गुप्तेश्वर पांडेय की बातों में यही चेतावनी छिपी दिखाई देती है।

पटना में दिया गया उनका यह बयान सिर्फ एक टिप्पणी नहीं, बल्कि बिहार के अपराध और पुलिसिंग के पुराने ढांचे पर गंभीर सवाल की तरह सामने आया है। अब देखना यह होगा कि इस बयान पर राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में कैसी प्रतिक्रिया आती है। लेकिन इतना तय है कि पूर्व डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय ने एक बार फिर ऐसा मुद्दा उठा दिया है, जो बिहार की स्मृति, शासन और अपराध इतिहास—तीनों को एक साथ छूता है।

https://maannews.acnoo.com/public/frontend/img/header-adds/adds.jpg

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *